मारा राम तमे सीताजी नी तोले न आवो

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सीताजी

आज दशेरा के पावन अवसर पर हम सीताजी को कैसे भूल शकते हे. हम हमेशा राम को महत्व देते हे और साथ में सीता को याद करते हे, जैसे जय सियाराम बोलकर. क्या क्या नही सहा सिताजीने – वनवास, फिर रावण, अग्निपरीक्षा, और रामराज्य बचाने के हेतु अपने ही पति ने त्याग कर दिया और फिर से वनवास. अकेले ही रही गर्भवती हो कर, दो दो बच्चो को अकेले बड़ा किया, फिर भी हम कभी भी सीता नवमी को राम नवमी की तरह त्यौहार नही मनाते. उनके प्रति ये भेदभाव, क्या इसलिए की वो एक औरत हे? क्या हम उनको अन्याय तो नही कर रहे?

मुझे लगता हे की हम हमेशा सीता को एक त्याग की मूर्ति के रूप में देखते है, और उसी का उदाहरन दे दे कर नारी को बलिदान की मूर्ति बनने की प्रेरणा देते है। इस ज़माने में हमे उस दिन सीताजी जो जरूर याद करना चाहिये जिस दिन उन्होंने राम के साथ वापस जाने की जगह, अपने आप को धरती मे समा लिया। शायद वो देवी अपनी बाकी की पूरी जिंदगी जंगल में ही रही होगी, बिना पति, बिना बेटो के, और ये पुरुष प्रधान समाज ये सहन नही कर पाया होगा, और पौराणिक काल ने उनको धरती में समा गयी कहना मुनासिब समजा हो. जिस दिन सिताजी ने राम का साथ न देनेका निर्णय लिया उस दिन को हमे नारी स्वतंत्रता का उदय मानकर उस दिन को त्यौहार मनाना चाहिए.

नारी हमेशा से त्याग और बलिदान की मूरत रही हे, लेकिन वोही नारी एक दिन जब खुद निर्णय लेती हे, अपने वजूद को समजती हे और अपने आप को मान देने के लिए खुद खड़ी होती हे, तो समाज उसे समज नही पाता. और रामायण ने उसे जमीन में समा लिया. काश रामायण में सीता जो बचपन में परशुराम का बाण चलाती थी, वो धरती में न समाकर, बाकी की जिंदगी वन में न काटकर, एक योध्धा बनके, नये राज्य की स्थापना करती तो आज ये पुरुषप्रधान समाज न होते, और स्त्री को सही में समकक्ष माना जाता.

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